स्लामिक आतंकवाद की काली छाया अब भारत के उन पेशेवरों पर पड़ रही है, जिन्हें समाज ‘धरती का भगवान’ कहकर पूजता है अर्थात डॉक्टरों पर। यह न केवल चिकित्सा पेशे का अपमान है, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा भी। जम्मू-कश्मीर से हरियाणा, गुजरात और उत्तर प्रदेश तक फैले इस ‘व्हाइट कॉलर टेरर नेटवर्क’ ने वैचारिक कट्टरता के जहर को शिक्षा और सेवा के आड़ में फैलाने की कोशिश की है। जैश-ए-मोहम्मद (JeM), इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रांत (ISKP) और अंसार गजवात-उल-हिंद जैसे संगठनों से जुड़े ये तथाकथित पढ़े-लिखे डॉक्टर न केवल हथियार जमा रहे थे, बल्कि विस्फोटक और जैविक जहर की तैयारी कर रहे थे। ये बताता है कि आतंकवाद अब जंगलों या सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि शहरों के अस्पतालों और विश्वविद्यालयों में घुस चुका है।
डॉक्टर आदिल राठर: जिहाद की राह पर गया अनंतनाग का डॉक्टर
इस नेटवर्क में पहली गिरफ्तारी श्रीनगर के अनंतनाग मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर आदिल अहमद राठर की हुई। उसके लॉकर से पुलिस ने AK-47 राइफल बरामद की। जांच में पता चला कि उसका सीधा संबंध जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवात-उल-हिंद से था। अस्पताल प्रशासन ने तुरन्त उसे बर्खास्त कर दिया और उसके सात सहयोगियों से गहन पूछताछ की, जिनमें डॉक्टर बाबर, डॉक्टर अहमद और डॉक्टर दानिश शामिल हैं।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, आदिल अक्सर देर रात तक बाहर रहता था और हालिया दिनों में उसने अचानक छुट्टी लेकर अस्पताल छोड़ दिया था। गिरफ्तारी के दिन जब उसका दोस्त डॉक्टर बाबर उसे बस स्टैंड छोड़ने जा रहा था, उसी समय श्रीनगर पुलिस ने उसे धर दबोचा।
हरियाणा का आतंकी नेटवर्क: डॉक्टर मुजम्मिल और अल-फलाह यूनिवर्सिटी
इस साजिश का दूसरा बड़ा खुलासा हरियाणा के फरीदाबाद में हुआ। यहां डॉ. मुज़म्मिल शकील नामक कश्मीर का डॉक्टर पकड़ा गया जो अल-फलाह यूनिवर्सिटी में कार्यरत था। उसके ठिकानों से 360 किलो अमोनियम नाइट्रेट और 2563 किलो विस्फोटक सामग्री मिली, इतना बारूद कि कई बड़े शहरों को निशाना बनाया जा सकता था।
उसी संस्थान की एक महिला डॉक्टर शाहीन शाहिद को भी 7 नवंबर को गिरफ्तार किया गया, जिसकी कार से “कैरोम कॉक” नाम की असॉल्ट राइफल बरामद हुई। जांच एजेंसियां अब यह पता लगा रही हैं कि क्या यूनिवर्सिटी परिसर में आतंकी तैयारियों से जुड़ी गतिविधियाँ चल रही थीं।
गुजरात एटीएस का बड़ा खुलासा: “रिसिन जहर” तैयार कर रहा था डॉक्टर
इसी बीच गुजरात एटीएस ने हैदराबाद निवासी डॉक्टर अहमद मोहियुद्दीन सैयद को गिरफ्तार किया, जो चीन से मेडिकल पढ़ाई कर चुका है। जांच में सामने आया कि वह “रिसिन” नाम के घातक ज़हर की तैयारी कर रहा था, जो अरंडी के बीजों से बनता है। उसने तीन प्रमुख भीड़भाड़ वाले इलाकों दिल्ली की आज़ादपुर मंडी, अहमदाबाद के नरोडा फ्रूट मार्केट और लखनऊ के आरएसएस कार्यालय की महीनों तक रेकी की थी।
उसकी कार से तीन विदेशी पिस्टल, 30 कारतूस और कई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस जब्त किए गए। हथियार की आपूर्ति करने आए यूपी के दो आतंकियों, सुहैल और आज़ाद सुलेमान, को भी पालनपुर से गिरफ्तार किया गया।
दिल्ली धमाका और आतंकी डॉक्टरों का जाल
फरीदाबाद मॉड्यूल का भंडाफोड़ दिल्ली के लाल किले ब्लास्ट से जुड़ा हुआ नजर आ रहा है, जहां डॉ. उमर मोहम्मद जो जीएमसी अनंतनाग से पढ़ा और अल-फलाह में कार्यरत था ने लाल किले के पास कार में विस्फोट किया। इस ब्लास्ट में 13 लोगों की मौत हुई। उमर JeM से जुड़ा पाया गया है।
इसके अलावा आज ही पुलवामा से उमर का करीबी दोस्त डॉ. सज्जाद अहमद को गिरफ्तार किया गया है, जो इस्लामिक आतंकवाद में लिप्त था। दोनों के बीच पिछले कई महीनों से संपर्क बने हुए थे और वे इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP) से प्रेरित होकर दिल्ली हमले की साजिश में जुटे थे।
साथ ही लखनऊ की इंटिग्रल यूनिवर्सिटी में एटीएस ने डॉक्टर परवेज के घर दबिश दी, जो एक अन्य आतंकी डॉक्टर शाहीन शाहिद के साथ मिलकर काम कर रहा था। जांच में पता चला कि यह नेटवर्क न केवल शैक्षणिक संस्थानों बल्कि अस्पतालों में भी सक्रिय था।
इस नेटवर्क से जुड़े कश्मीर के मौलवी इरफान अहमद, श्रीनगर के मकसूद अहमद डार, आरिफ निसार डार, यासिर उल-अशरफ और गांदरबल के जमीर अहमद अहंगर जैसे कई नाम जांच के दायरे में हैं। पुलिस का मानना है कि इन डॉक्टरों ने अपने पेशे का इस्तेमाल सामाजिक विश्वास अर्जित करने और उस आड़ में आतंकी गतिविधियों को चलाने के लिए किया।
इस पूरे मामले ने साफ कर दिया है कि आतंकवाद अब सिर्फ सीमापार या जंगलों से नहीं, बल्कि प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों की दीवारों के भीतर से पैदा हो रहा है। जिन डॉक्टरों का धर्म मानवता की रक्षा है, इस्लामिक आतंकी उन डॉक्टर्स के पेशे में आकर हत्या और विनाश के उपकरण तैयार कर रहे हैं।
ये आतंकवाद भारत के लिए “व्हाइट कॉलर जिहाद” की चेतावनी हैं यानी ऐसा आतंक जो बंदूक से नहीं, बल्कि दिमाग और तकनीक से संचालित है। यह आतंकी नेटवर्क इस्लाम की रक्षा के नाम पर शिक्षा, अनुसंधान और वैज्ञानिक सुविधाओं का दुरुपयोग कर रहा था।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA), ATS और खुफिया एजेंसियाँ इस पूरे नेटवर्क की फंडिंग, डिजिटल ट्रेल और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन की गहराई से जांच कर रही हैं। गृह मंत्रालय ने राज्यों को हाई अलर्ट पर रखा है और मेडिकल कॉलेजों व निजी विश्वविद्यालयों में सुरक्षा जांच की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।

