बांग्लादेश में 30 साल के हिंदू युवक दीपू चंद्र को इस्लामिक जिहादी भीड़ ने इसलिए मार डाला क्योंकि वो हिंदू था. दीपू चंद्र दास का अपराध ये था कि उसने ये कहा था कि इस दुनिया में सभी धर्म बराबर हैं और सभी धर्मों के भगवान एक हैं. मजहबी कट्टरपंथ में चूर Bangladesh की इस्लामिक चरमपंथी इस बात से भड़क उठे और इसे पैगंबर मोहम्मद का अपमान बताकर Dipu Chandra Das को बर्बर अंदाज में मारा
इस्लामिक भी दीपू चंद्र दास को खींच ले गई, सड़क पर पर गिराकर हजारों की भीड़ उसे पीटने लगी-कुचलने लगी, इस दौरान अल्लाह हू अकबर के नारे लगाए जाते रहे, Dipu Chandra Das को पीट-पीटकर लहूलुहान कर दिया गया, उनके कपड़े फाड़ डाले गए, उन्हें नंगा करके घसीटा गया. जिहादी भीड़ इसके बाद भी नहीं रुकी बल्कि दीपू को पेड़ से लटका दिया गया. इसके बाद भीड़ ने जोर-जोर से अल्लाह हू अकबर के नारे लगाए और दीपू चंद्र दास को ज़िंदा जला दिया.
ऐसा नहीं है कि दीपू ने बचने की कोशिश नहीं की. हत्या से पहले का दीपू चंद्र दास का वीडियो सामने आया है, जिसमें वो बांग्लादेश की पुलिस और सुरक्षाबलों की शरण में हैं. दीपू पुलिस से गिड़गिड़ाता रहा कि उसने कुछ नहीं किया लेकिन पुलिस ने उसे बचाने के बजाय उसको इस्लामिक जिहादियों के हवाले कर दिया इसके बाद दीपू को पीटा गया, नंगा करके घसीटा गया, पेड़ पर लटकाया गया और जिंदा जला दिया गया ये उस बांग्लादेश में हिंदू के साथ हुआ जो बांग्लादेश 75 साल तक पहले तक हिंदुस्तान ही था फिर वहां इस्लामिक कब्ज़ा हुआ, इस्लामिक देश बना और हिंदुओं का ये हश्र होना शुरू हुआ.
आखिर ये घटना क्या संदेश देती है ? इस घटना का सीधा सार यही है कि जहां-जहां हिंदू घटा, वहां-वहां कटा. बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं का कत्लेआम इसका जीवंत उदाहरण है. आज दुनिया के मैप में जो स्थान पाकिस्तान और बांग्लादेश का है, 14 अगस्त 1947 तक वो सब हिंदुस्तान हुआ करता था. वहां के मंदिरों में घंटियां बजती थीं, सनातन की धर्म ध्वजा भगवा शान से लहराती थी, जहां भगवान राम के पुत्र लव का बसाया हुआ शहर लाहौर था, जहां ज्ञान की गंगा का केंद्र रावलपिंडी था, जहां ढाका में सनातन की 51 शक्तिपीठों में से एक ढाकेश्वरी माता का मंदिर था, वहां धीरे-धीरे हिंदू आबादी कम होना शुरू हुई, मुस्लिम आबादी बढ़ी और 14 अगस्त 1947 को मजहब अर्थात इस्लाम की इसी आबादी के नाम पर भारत के टुकड़े कर दिए गए और इस्लामिक देश पाकिस्तान को बना दिया गया और इसी पाकिस्तान से 1971 में एक और इस्लामिक देश बांग्लादेश बना
जब इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान और बांग्लादेश बना था, तब भी वहां धर्म के नाम हिंदुओं का कत्लेआम हुआ और आज भी पाकिस्तान और बांग्लादेश में धर्म के आधार पर हिंदुओं का क़त्ल और संहार हो रहा है. सिर्फ 75 साल पहले तक हिंदुस्तान रहे एक हिस्से में हिंदुओं को इस्लामिक जिहादियों द्वारा इसीलिए मारा रहा है क्योंकि वो हिंदू हैं.
बांग्लादेश में दीपू चंद्र दास की बर्बर हत्या की घटना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जो स्थिति बांग्लादेश की है, वो स्थिति भारत के भी कुछ हिस्सों में बनती जा रही है. भारत के भी कुछ हिस्से संवेदनशील और अति संवेदनशील घोषित कर दिए हैं. ये सभी हिस्से वो हिस्से वो हिस्से हैं, हिंदू घट गया है और मुस्लिम आबादी बढ़ गई है. भारत के जिन हिस्सों में आज भी हिंदू ज्यादा हैं, वहां शांति है, कानून का शासन है, वहां सभी धर्म-मजहबों के लोग शांति से अपने पर्व त्यौहार मनाते हैं
वहीं देश के जिन हिस्सों में मुस्लिम आबादी हिंदुओं के बराबर या ज्यादा हो गई है, उन्हें संवेदनशील या अतिसंवेदनशील घोषित किया गया है. इन हिस्सों में हिंदू बिना डर के अपने त्यौहार नहीं मना सकता. अगर हिंदू अपने त्यौहार मनाए तो इससे मुस्लिमों के एक बड़े वर्ग की भावनाएं आहत हो जाती हैं. हिंदुओं की शोभायात्राओं पर हमले होते हैं, पत्थर फेंके जाते हैं, हिंदुओं को मार दिया गया जाता है, मंदिरों में पूजा करने से रोका जाता है. स्थिति ये हो जाती है कि हिंदुओं को अपने ही देश में त्यौहार मनाने के लिए परमिशन लेनी पड़ती है और पुलिस की सुरक्षा में त्यौहार मानना पड़ता है
अगर भारत का हिंदू समाज और भारत के सियासी दल नहीं जागे तो जो स्थिति 1947 में बनी थी, जो स्थिति आज बांग्लादेश और पाकिस्तान में बन रही है, वो फिर से भारत में बन सकती है. गजवा-ए-हिंद इसी का एक रूप है, जिसकी बात इस्लामिक कट्टरपंथी करते है
ये बात उन नेताओं और संगठनों को समझनी होगी जो जाति का कार्ड खेलकर हिंदुओं को बांटने की साजिश करते रहते हैं, ताकि उनकी सियासी रोटियां सिकती रह सकें. दीपू चंद्र दास को इसलिए नहीं मारा गया कि वो दलित था, पिछड़ा था या सवर्ण था बल्कि उसे इसलिए मारा गया क्योंकि वो हिंदू था. दीपू चंद्र दास अगर जय भीम और जय मीम का नारा लगाता तो क्या इस्लामिक कट्टरपंथी भीड़ उसको छोड़ देती ? बिल्कुल नहीं, दीपू चंद्र दास को इसके बाद भी मारा जाता क्योंकि इन कट्टरपंथियों के हिसाब से चाहे वो ब्राह्मण, राजपूत या कोई भी सवर्ण हों, दलित, पिछड़े या आदिवासी हों, वो सभी के सभी काफिर हैं और इस सोच के हिसाब से काफिर तो वाजिब-उल-कत्ल हैं
अगर आप चाहते हैं कि भारत भारत बना रहे, भारत का हाल बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसा न हो, धर्म के आधार 1947 जैसी स्थिति इस बचे हुए भारत में न बने तो भारत में हिंदू को बहुसंख्यक बनाए रखना होगा. भारत तभी तक भारत बना रह सकता है, जब तक भारत में हिंदू आबादी ज्यादा बनी रहेगी और अगर ऐसा नहीं हुआ, हिंदू घटता और मुस्लिम बढ़ता रहा तो जैसा 1947 में हुआ था, वैसा फिर से हो सकता है. इतिहास गवाह है कि जब-जब हिंदू घटा है, तब-तब कटा है, और जहां-जहां हिंदू घटा है, वहां-वहां देश बंटा है

