बिहार की राजनीति में आज एक विशाल युग का समापन होने जा रहा है। राज्य की सत्ता के केंद्र बिंदु रहे नीतीश कुमार, जिन्होंने महज 105 दिन पहले ही 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, अब बिहार की बागडोर छोड़ने के लिए तैयार हैं। उनका यह निर्णय न केवल एक व्यक्तिगत कदम है, बल्कि बिहार में एक बड़े पीढ़ीगत बदलाव का अंतिम चरण माना जा रहा है। नीतीश कुमार के इस फैसले ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सबसे बड़ी पार्टी, भाजपा के लिए बिहार की राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह से परिवर्तित कर दिया है।
नीतीश कुमार का दिल्ली कूच और राज्यसभा नामांकन
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वयं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से यह जानकारी साझा की कि वे अब राज्यसभा जा रहे हैं। इस सियासी घटनाक्रम को तब आधिकारिक पुख्ता प्रमाण मिला जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की गरिमामयी मौजूदगी में नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल कर दिया। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने का स्पष्ट अर्थ है कि बिहार की सत्ता में अब एक नई व्यवस्था लागू होने जा रही है। राज्य को जल्द ही एक नया मुख्यमंत्री मिलेगा और सत्ता का केंद्र पटना से दिल्ली की ओर शिफ्ट होगा।
भाजपा के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि
हिंदी हार्टलैंड की प्रमुख पार्टी मानी जाने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक स्वर्णिम क्षण है। देश के दूसरे सबसे बड़े हिंदी भाषी राज्य, बिहार में भाजपा अब तक गठबंधन का हिस्सा तो रही, लेकिन कभी अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी थी। नीतीश कुमार के इस कदम के बाद अब बिहार को पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री मिलना तय माना जा रहा है। पिछले दो दशकों और चार विधानसभा चुनावों से बिहार की सत्ता की कमान जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के हाथों में रही है। अब जब भाजपा का मुख्यमंत्री बनेगा, तो जदयू के गठन के बाद यह पहला अवसर होगा जब यह दल बिहार की सरकार में एक सहयोगी (Junior Partner) की भूमिका में नजर आएगा।
रणनीतिक परिपक्वता और गठबंधन का भविष्य
बिहार जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक और परिपक्व राज्य में सत्ता का यह हस्तांतरण भाजपा की एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीति के माहिर खिलाड़ी कहे जाने वाले नीतीश कुमार को विश्वास में लेकर इस पूरी योजना को जिस बारीकी से अंजाम दिया गया, वह भारतीय राजनीति में विरला है। इस पूरे बदलाव की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि न तो गठबंधन के साथियों के बीच कोई दरार आई, न ही कोई विवाद या शोर-शराबा हुआ।
भाजपा और जेडीयू ने मिलकर इस ‘पावर शिफ्ट’ को बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से क्रियान्वित किया है। हालांकि, नए मुख्यमंत्री के नाम की आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है, लेकिन यह तय है कि अब बिहार की राजनीति एक नई दिशा में अग्रसर है। इस बदलाव को देश की राजनीति में एक बहुत बड़ा सियासी मील का पत्थर माना जा रहा है, जिसका असर आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर भी पड़ना निश्चित है।

