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भारत के रोजगार परिदृश्य में सुधार: अक्टूबर-दिसंबर 2025 तिमाही में बेरोजगारी दर में गिरावट

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स्वास्तिक सहारा वेब डेस्क
वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर 2025) में भारत की बेरोजगारी दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर घटकर 4% और शहरी क्षेत्रों में 6.7% रह गई है। रिपोर्ट महिला कार्यबल की बढ़ती भागीदारी और स्वरोजगार के प्रति बढ़ते रुझान को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत के रूप में रेखांकित करती है।

भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने अक्टूबर-दिसंबर 2025 तिमाही के लिए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़े जारी कर दिए हैं। आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि भारतीय श्रम बाजार में सुधार की गति तेज हुई है और बेरोजगारी दर में क्रमिक गिरावट दर्ज की गई है। यह रिपोर्ट 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग के नागरिकों के आर्थिक सशक्तिकरण की एक उत्साहजनक तस्वीर पेश करती है।

ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी में गिरावट: ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की स्थिति में तेज सुधार हुआ है। अक्टूबर-दिसंबर 2025 की तिमाही में ग्रामीण बेरोजगारी दर घटकर 4 प्रतिशत रह गई है, जो इससे पिछली तिमाही (जुलाई-सितंबर 2025) में 4.4 प्रतिशत थी। विशेष रूप से ग्रामीण पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए रोजगार के अवसरों में वृद्धि देखी गई है।

वहीं, शहरी क्षेत्रों में भी सकारात्मक रुख बना हुआ है। शहरी बेरोजगारी दर जो पिछली तिमाही में 6.9 प्रतिशत थी, वह अब गिरकर 6.7 प्रतिशत पर आ गई है। शहरी सुधार में मुख्य भूमिका पुरुषों की रही है, जिनकी बेरोजगारी दर 6.2 प्रतिशत से कम होकर 5.9 प्रतिशत रह गई है।

महिला कार्यबल की बढ़ती शक्ति: सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण और संतोषजनक उपलब्धि महिलाओं की श्रम बल में बढ़ती हिस्सेदारी है। श्रम बल सहभागिता दर (LFPR), जो अर्थव्यवस्था में सक्रिय कार्यबल का पैमाना है, उसमें उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अक्टूबर-दिसंबर 2025 के दौरान समग्र एलएफपीआर (LFPR) बढ़कर 55.8 प्रतिशत हो गया है। विशेष रूप से, 15 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं के लिए यह दर 33.7 प्रतिशत से उछलकर 34.9 प्रतिशत हो गई है, जो महिला सशक्तिकरण और समावेशी आर्थिक विकास का प्रमाण है।

पारंपरिक क्षेत्रों का योगदान और स्वरोजगार का उदय: भारतीय अर्थव्यवस्था में आज भी कृषि क्षेत्र रोजगार का सबसे बड़ा आधार बना हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुल नियोजित श्रमिकों में से 58.5 प्रतिशत कृषि क्षेत्र से जुड़े हैं। यह आंकड़ा पिछली तिमाही के 57.7 प्रतिशत के मुकाबले अधिक है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिरता को दर्शाता है।

रोजगार के स्वरूप में एक बड़ा बदलाव ‘स्वरोजगार’ (Self-employment) के रूप में सामने आया है। वर्तमान में लोग नौकरी पर निर्भर रहने के बजाय अपना उद्यम शुरू करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार:

  • ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार: 62.8% से बढ़कर 63.2% हुआ।

  • शहरी क्षेत्रों में स्वरोजगार: 39.3% से बढ़कर 39.7% हुआ।

शहरी क्षेत्रों में ‘तृतीयक क्षेत्र’ (Tertiary Sector/Services) रोजगार का प्रमुख स्रोत बना हुआ है, जिसने कुल 61.9 प्रतिशत शहरी श्रमिकों को काम दिया है।

कार्यबल के आकार में वृद्धि: जनसंख्या अनुमानों के आधार पर एनएसओ ने बताया है कि देश में कामकाजी लोगों की कुल संख्या में इजाफा हुआ है। जुलाई-सितंबर 2025 में जहां औसतन 56.2 करोड़ लोग कार्यरत थे, वहीं अक्टूबर-दिसंबर 2025 में यह संख्या बढ़कर 57.4 करोड़ हो गई है। इस कार्यबल में 40.2 करोड़ पुरुष और 17.2 करोड़ महिलाएं शामिल हैं।

सही दिशा में अर्थव्यवस्था: श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR) का 52.2 प्रतिशत से बढ़कर 53.1 प्रतिशत होना इस बात की पुष्टि करता है कि देश में रोजगार सृजन की दर आबादी की वृद्धि के अनुरूप है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि जहां कृषि और स्वरोजगार ने अर्थव्यवस्था को संभाला है, वहीं आने वाले समय में संगठित क्षेत्र (Organized Sector) में और अधिक औपचारिक नौकरियों के सृजन पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक होगा।

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