देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में नियमन को लेकर चल रहे व्यापक विरोध और कानूनी रस्साकशी के बीच, माननीय उच्चतम न्यायालय ने आज एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में 13 जनवरी 2026 को जारी किए गए नए नियमों के कार्यान्वयन पर शीर्ष अदालत ने तत्काल प्रभाव से रोक (Stay) लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक इस मामले में अंतिम निर्णय नहीं आ जाता या केंद्र सरकार द्वारा स्थिति स्पष्ट नहीं की जाती, तब तक वर्ष 2012 के दिशानिर्देश ही लागू रहेंगे और प्रभावी माने जाएंगे।
न्यायिक समीक्षा और पीठ की चिंताएं: आज हुई बेहद अहम सुनवाई के दौरान, सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने यूजीसी की नई अधिसूचना की मंशा, शब्दावली और उसके संभावित सामाजिक प्रभावों पर गंभीर सवाल उठाए। न्यायालय ने “प्रथम दृष्टया” (Prima Facie) यह पाया कि नए नियमों में प्रयुक्त भाषा अत्यंत अस्पष्ट है, जिसके चलते इनका व्यापक दुरुपयोग होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, “मुझे खेद है कि प्रथम दृष्टया ये नियम अस्पष्ट हैं और इनका दुरुपयोग होने की संभावना है। 75 वर्षों में एक जातिविहीन समाज के निर्माण की दिशा में हमने जो भी प्रगति की है, क्या यह कदम हमें उल्टी दिशा में ले जाने वाला नहीं है?” न्यायालय का यह रुख स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका शैक्षणिक परिसरों में किसी भी प्रकार के सामाजिक विभाजन को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है।
सामाजिक एकता और अमेरिकी उदाहरण: सुनवाई के दौरान पीठ ने भारत की सामाजिक संरचना और एकता पर विशेष जोर दिया। सीजेआई ने अमेरिका में ऐतिहासिक रूप से रहे नस्लीय अलगाव (Segregation) का उदाहरण देते हुए चेतावनी दी। उन्होंने कहा, “हमें उस स्थिति की ओर नहीं बढ़ना चाहिए जहाँ हमारे पास अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग स्कूल हों, जैसा कि अमेरिका में देखा गया था जहाँ गोरे और अश्वेत बच्चों के लिए अलग व्यवस्थाएं थीं। भारत की एकता हमारे शैक्षणिक संस्थानों में प्रतिबिंबित होनी चाहिए।”
न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि यदि विश्वविद्यालय, कॉलेज और स्कूल ही समाज से अलग-थलग या बंटे हुए रहेंगे, तो इसका असर पूरे समाज पर पड़ेगा। यदि छात्र कैंपस के भीतर ही विभाजित माहौल में रहेंगे, तो वे बाहरी दुनिया में सौहार्दपूर्ण व्यवहार कैसे कर पाएंगे? यह एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न है।
विशेषज्ञ समिति के गठन का निर्देश: अदालत ने यह माना कि यूजीसी के नए नियमों को तैयार करते समय व्यापक विमर्श और स्पष्टता का अभाव रहा है। इस कमी को दूर करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह इन नियमों की समीक्षा के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन करे। इस समिति में निम्नलिखित क्षेत्रों के दिग्गजों को शामिल करने का सुझाव दिया गया है:
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शिक्षाविद (Academicians)
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न्यायविद (Jurists)
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सामाजिक अभियंता (Social Engineers)
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सामाजिक अभिकर्ता (Social Activists)
न्यायालय का मत है कि यह समिति नियमों की भाषा को स्पष्ट करने और यह सुनिश्चित करने का कार्य करेगी कि समाज में किसी भी प्रकार का विभाजन न हो। मुख्य न्यायाधीश ने सॉलिसिटर जनरल के माध्यम से केंद्र को निर्देश दिया कि इन विनियमों की तत्काल समीक्षा की आवश्यकता है।
न्यायमूर्ति बागची की टिप्पणी: 3 ‘E’ बनाम 2 ‘C’ सुनवाई के दौरान पीठ में शामिल जस्टिस बागची ने भी नियमों की प्रासंगिकता पर तार्किक सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि रेगुलेशन में इस्तेमाल किए गए शब्दों से यह आशंका उत्पन्न होती है कि इनका दुरुपयोग हो सकता है। एक निष्पक्ष समाज की वकालत करते हुए उन्होंने पूछा, “जब हमारे पास पहले से ही 3 ‘E’ (संभवतः Education, Equity, Empowerment के संदर्भ में) मौजूद हैं, तो फिर 2 ‘C’ (संभवतः Caste, Community के संदर्भ में) की नई आवश्यकता क्यों आन पड़ी है?” यह टिप्पणी नियमों की वैधानिक आवश्यकता पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है।
केंद्र सरकार को नोटिस और अगली सुनवाई: शीर्ष अदालत ने याचिकाओं में उठाए गए मुद्दों पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा है कि वह सभी आपत्तियों पर गंभीरता से विचार करे और अपना पक्ष रखे। फिलहाल, यूजीसी के नए नियम ‘ठंडे बस्ते’ में चले गए हैं। न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 19 मार्च की तारीख मुकर्रर की है। तब तक सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को 2012 के पुराने नियमों का ही पालन करना अनिवार्य होगा।
विरोध का कारण और पृष्ठभूमि: ज्ञात हो कि यूजीसी द्वारा 13 जनवरी 2026 को जारी नए नियमों के खिलाफ देश भर के विश्वविद्यालयों में छात्र संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन किया जा रहा था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नए नियमों में केवल ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग के छात्रों के उत्पीड़न पर कार्रवाई का प्रावधान किया गया है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों के संरक्षण को लेकर कोई स्पष्ट आश्वासन या प्रावधान नहीं है। छात्रों के बीच यह धारणा बन रही थी कि ये नियम भेदभावपूर्ण हैं और इसका इस्तेमाल किसी विशेष वर्ग को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि नियमों में “सुरक्षा” के प्रावधान सभी के लिए समान और स्पष्ट होने चाहिए। सीजेआई ने कहा, “हमें जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए, लेकिन जिन्हें सुरक्षा की जरूरत है, उनके लिए प्रभावी तंत्र भी होना चाहिए। राज्य सरकारों को एससी-एसटी के लिए कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन यह संतुलन संविधान के दायरे में होना चाहिए।”
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था के धर्मनिरपेक्ष और समावेशी चरित्र को बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अब सबकी निगाहें केंद्र सरकार द्वारा गठित की जाने वाली समिति और 19 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ यह तय होगा कि भारतीय परिसरों में समानता और अनुशासन के नियम क्या होंगे।

