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BJP के कमल की खुशबू से महक उठा बंगाल, ध्वस्त हुआ ममता का किला, तमिलनाडु में TVK की विजय

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स्वास्तिक सहारा वेब डेस्क
4 मई 2026 के ऐतिहासिक जनादेश ने भारत का राजनीतिक मानचित्र बदल दिया है। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने 207 सीटें जीतकर ममता बनर्जी के 15 वर्षीय शासन का अंत कर दिया, जहाँ स्वयं मुख्यमंत्री को भवानीपुर में हार झेलनी पड़ी। असम में एनडीए की हैट्रिक, केरल में यूडीएफ की वापसी और तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी के उदय ने राज्यों की सत्ता संरचना को नया स्वरूप दिया है।

4 मई 2026, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में वह स्वर्णिम दिन बन गया है जब चुनावी नतीजों ने न केवल सत्ता परिवर्तन किया, बल्कि दशकों पुरानी राजनीतिक मान्यताओं को भी ध्वस्त कर दिया। पांच राज्यों—पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के परिणाम जब सामने आए, तो देश दंग रह गया। सबसे बड़ी गूँज ‘सोनार बांग्ला’ से सुनाई दी, जहाँ भाजपा ने एक ऐसा ‘चक्रव्यूह’ रचा जिसने ममता बनर्जी के अजय माने जाने वाले साम्राज्य को धूल चटा दी।

पश्चिम बंगाल: 207 सीटों का महा-संग्राम और ‘दीदी’ की विदाई

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 की यह जीत कोई सामान्य चुनावी जीत नहीं है। यह एक वैचारिक युद्ध था जिसे भारतीय जनता पार्टी ने पिछले 11 वर्षों से लड़ा था। 294 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 207 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल कर इतिहास रच दिया है और 15 वर्षों से राज्य की सत्ता में काबिज TMC मात्र 80 सीटों पर सिमट गई।

हार का चेहरा: ममता बनर्जी और भवानीपुर का उलटफेर

इस चुनाव का सबसे बड़ा ‘क्लाइमेक्स’ तब आया जब टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी अपने ही गढ़ भवानीपुर से चुनाव हार गईं। उन्हें भाजपा के सुवेंदु अधिकारी ने 15,100 से अधिक मतों के अंतर से पराजित किया। यह हार केवल एक सीट की हार नहीं थी, बल्कि टीएमसी के उस ‘अहंकार’ की हार थी जिसने 2021 के बाद बंगाल को हिंसा की आग में झोंकने की कोशिश की थी। जनता ने इस बार ‘चुपचाप कमल छाप’ के मंत्र को आत्मसात किया।

संगठन की जीत: शिव प्रकाश का मौन परिश्रम

इस जीत का विश्लेषण तब तक अधूरा है जब तक शिव प्रकाश जी के योगदान का जिक्र न हो। 2015 में जब उन्हें बंगाल की जिम्मेदारी दी गई थी, तब भाजपा वहां महज 2-3 सीटों वाली पार्टी थी। शिव प्रकाश जी ने बिना किसी शोर-शराबे के 78,000 बूथों पर संगठन का वो ढांचा खड़ा किया, जिसने 2026 में टीएमसी की ‘गुंडागर्दी’ का मुकाबला किया। 2019 में 18 लोकसभा सीटें और 2021 में 77 विधानसभा सीटें जीतना उसी संगठन की मजबूती का परिणाम था, जो आज 207 तक पहुँच गया।

प्रमुख कारक: तुष्टीकरण बनाम विकास

भाजपा की जीत के पीछे संदेशखाली जैसे मुद्दे, भ्रष्टाचार के आरोप और भारी तुष्टीकरण के खिलाफ जन-आक्रोश मुख्य कारण रहे। पीएम मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ और अमित शाह के माइक्रो-मैनेजमेंट ने बंगाल के ग्रामीण इलाकों में पैठ बनाई। मतुआ समुदाय से लेकर राजबंशी और आदिवासी क्षेत्रों तक, भाजपा ने टीएमसी के वोट बैंक को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया।

तमिलनाडु: सुपरस्टार विजय का ‘थलापति’ अवतार

दक्षिण भारत में इस बार द्रविड़ राजनीति का पुराना ढर्रा टूट गया। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) ने 108 सीटों पर कब्जा कर सबको हैरान कर दिया। डीएमके (DMK) के शासन के खिलाफ युवाओं में जो गुस्सा था, उसे विजय ने भुनाया। हालांकि किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, लेकिन विजय सत्ता बनाने की ओर बढ़ रहे हैं। स्टालिन की हार और एआईएडीएमके का ढलना यह संकेत देता है कि तमिलनाडु अब सुपरस्टार्स की राजनीति के नए दौर में प्रवेश कर चुका है। DMK 59 और AIADMK मात्र 47 सीटों पर सिमट गई। बंगाल में कमल खिलाने वाली भाजपा तमिलनाडु में कमाल नहीं कर सकी और मात्र 1 सीट पर सिमट गई।

केरल: हर पांच साल का ‘रिवाज’ बरकरार

केरल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह एक ही दल को लगातार दो बार से ज्यादा मौका नहीं देता। 2021 में इतिहास रचने वाले पिनाराई विजयन इस बार अपनी सत्ता नहीं बचा पाए। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने 140 में से 99 सीटें जीतकर शानदार वापसी की है। ‘लाल किले’ का ढहना यह दर्शाता है कि केरल की जनता अब भ्रष्टाचार और राजनीतिक हिंसा से मुक्ति चाहती थी। राहुल गांधी के प्रभाव और स्थानीय कांग्रेस नेताओं की एकजुटता ने यहाँ कमाल कर दिखाया। अकेले कांग्रेस ने 63 सीटें जीती। केरल में बीजेपी को 2016 के बंगाल जैसे संकेत मिले हैं। भाजपा ने केरल में लगभग 12% वोट हासिल किया और 3 सीटें जीती। बड़ी बात ये है कि भाजपा 6 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही जो इस बात का संकेत है कि राज्य में भगवा दल अपने पैर पसार रहा है।

असम: हिमंत बिस्वा सरमा की ‘अजेय’ हैट्रिक

पूर्वोत्तर में भाजपा का विजय रथ रुकने का नाम नहीं ले रहा है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में एनडीए ने 102 सीटों के साथ लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की है। असम में घुसपैठ के खिलाफ सख्त कानून, बुनियादी ढांचे का विकास और परिसीमन (Delimitation) के बाद बदले समीकरणों ने भाजपा को और मजबूत किया। यहाँ कांग्रेस और एआईयूडीएफ का गठबंधन भी भाजपा के ‘हिंदुत्व और विकास’ के मॉडल को नहीं डिगा पाया। अकेले भाजपा ने 82 सीटों पर जीत हासिल की है और कांग्रेस मात्र 19 सीटों पर सिमट गई। बदरुद्दीन अजमल की AIUDF 2 सीटों पर सिमट गई।

पुडुचेरी: स्थिरता की जीत

केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में जनता ने डबल इंजन की सरकार पर मुहर लगाई। AINRC-BJP गठबंधन ने 30 में से 17 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। यहाँ की जनता ने केंद्र के साथ टकराव के बजाय सहयोग की राजनीति को चुना, जिससे विकास कार्यों को गति मिल सके। NDA गठबंधन की AINRC ने 12, BJP ने 4 और AIADMK ने 1 सीट जीती है, जिससे NDA ने बहुमत का 16 सीटों का आंकड़ा पार कर लिया।

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