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‘बंटोगे तो कटोगे’ हो रहा सच… UGC पर बंटा हिंदू तो खुलकर जिहादियों के पक्ष में खड़े होने लगे विपक्षी

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स्वास्तिक सहारा वेब डेस्क
राजनीतिक दलों के इस बदले हुए व्यवहार के पीछे सबसे बड़ा कारण हिंदुओं का आपसी मतभेद है। विपक्ष यह जान चुका है कि UGC जैसे मुद्दों पर हिंदू आपस में ही लड़ रहे हैं और एक-दूसरे को गालियां दे रहे हैं। इसी बिखराव ने विपक्षी खेमे को यह भरोसा दिलाया है कि अब वे खुलकर हिंदू विरोधी एजेंडा चला सकते हैं और उनका वोट बैंक सुरक्षित रहेगा।

भारत की राजनीति में पिछले कुछ महीनों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। विशेष रूप से UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) से जुड़े विवादों के बाद हिंदू समाज जिस तरह से वैचारिक रूप से विभाजित हुआ, उसने विपक्षी दलों को एक बार फिर अपनी पुरानी ‘तुष्टीकरण’ की राजनीति पर लौटने का साहस दे दिया है। यह स्पष्ट हो गया है कि यदि हिंदू संगठित है, तभी तक हिंदू और हिंदुस्तान सुरक्षित है। जैसे ही यह एकता टूटती है, प्रहार सीधे संस्कृति और जीवन पर होने लगते हैं।

पिछले कुछ वर्षों से जो विपक्षी दल हिंदू वोटों के डर से इफ्तारी जैसे आयोजनों को छिपाकर या दबे पांव कर रहे थे, इस बार उन्होंने सारे पर्दे हटा दिए हैं। इस बार इफ्तारी न केवल खुलकर हुई, बल्कि हिंदू आस्थाओं को चुनौती देने के स्तर तक पहुँच गई। काशी में पवित्र गंगा मां के आंचल में इफ्तार का आयोजन किया गया और विडंबना देखिए कि वहां मांस की हड्डियां तक फेंकी गईं। जब प्रशासन ने दोषियों को गिरफ्तार किया, तो अखिलेश यादव और सुप्रिया श्रीनेत जैसी नेता उनके बचाव में ढाल बनकर खड़े हो गए।

तरुण हत्याकांड और विपक्षी नेताओं का दोहरा चरित्र

उत्तम नगर में दलित युवक तरुण की निर्मम हत्या ने विपक्षी राजनीति के असली चेहरे को बेनकाब कर दिया है। इस मामले में राहुल गांधी ने आधा किलोमीटर लंबा सोशल मीडिया पोस्ट लिखा, लेकिन गौर करने वाली बात यह थी कि उन्होंने तरुण को मारने वाली ‘जिहादी भीड़’ के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा। उन्होंने न तो तरुण को श्रद्धांजलि दी, बल्कि उल्टा तरुण की हत्यारी हिंसक भीड़ को ही ‘प्रताड़ित’ बताने की कोशिश की।

हद तो तब हो गई जब राहुल गांधी मोहम्मद दीपक से मिलने पहुँच गए, लेकिन उसी तरुण के परिवार से दूरी बना ली जिसे सरेआम मौत के घाट उतार दिया गया। यह चयनात्मक सहानुभूति स्पष्ट करती है कि विपक्ष अब यह मान चुका है कि हिंदू बंट चुका है और उसे अब हिंदुओं की परवाह करने की जरूरत नहीं है।

हिंदू उत्सवों और भावनाओं पर सीधा प्रहार

जैसे ही हिंदुओं ने एक-दूसरे को गालियां देना और जातियों में बंटना शुरू किया, विपक्षी प्रवक्ताओं के हमले तेज हो गए। जब-जब हिंदू समाज अपनी सुरक्षा या सम्मान के लिए आवाज उठाता है, उसे ‘आतंकी’ या ‘उन्मादी’ घोषित करने की मुहिम शुरू हो जाती है। पवन खेड़ा ने 4 मिनट का वीडियो जारी कर पवन खेड़ा ने रामनवमी और हनुमान जन्मोत्सव जैसे पवित्र पर्वों को हिंसा का केंद्र बताया, वहीं सुप्रिया श्रीनेत ने तरुण की हत्या के बाद न्याय मांग रहे आक्रोशित हिंदुओं की तुलना आतंकियों से कर दी। यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें पीड़ित को ही अपराधी सिद्ध कर दिया जाता है।

बंटेगा तो कटेगा: अस्तित्व का संकट

यह पूरी पटकथा इसलिए लिखी जा सकी क्योंकि विपक्ष की नजरों में अब हिंदू एक ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि एक ‘बंटा हुआ समाज’ है। विपक्षी दल जान चुके हैं कि आपसी कलह के कारण हिंदू अब प्रतिकार नहीं करेगा। सत्य यही है कि अगर हिंदू बंटेगा तो न केवल उसे काटा जाएगा, बल्कि कटने के बाद दुनिया के सामने उसे ही सांप्रदायिक, उन्मादी और हिंसक साबित किया जाएगा।

राजनीतिक दलों के इस बदले हुए व्यवहार के पीछे सबसे बड़ा कारण हिंदुओं का आपसी मतभेद है। विपक्ष यह जान चुका है कि UGC जैसे मुद्दों पर हिंदू आपस में ही लड़ रहे हैं और एक-दूसरे को गालियां दे रहे हैं। इसी बिखराव ने विपक्षी खेमे को यह भरोसा दिलाया है कि अब वे खुलकर हिंदू विरोधी एजेंडा चला सकते हैं और उनका वोट बैंक सुरक्षित रहेगा।

आज का राजनीतिक परिदृश्य यह संदेश दे रहा है कि सुरक्षा केवल संगठन में है। जब तक हिंदू संगठित था, राजनीति तिलक लगाने और मंदिर जाने की हो रही थी, लेकिन जैसे ही बिखराव आया, राजनीति फिर से हड्डियों और हत्यारों के समर्थन पर लौट आई है। हिंदुस्तान की सुरक्षा का एकमात्र मार्ग हिंदू एकता ही है।

हिंदू समाज को यह समझना होगा कि उनकी सुरक्षा उनकी संख्या में नहीं, बल्कि उनकी संगठन शक्ति में है। ‘बंटेगा तो कटेगा’ मात्र एक नारा नहीं, बल्कि कड़वी हकीकत है। यदि आज हिंदू समाज संगठित नहीं हुआ, तो न केवल उनकी धार्मिक परंपराओं का अपमान होगा, बल्कि हर तरुण की हत्या के बाद दोष भी हिंदू समाज के ही सिर मढ़ा जाएगा। हिंदुस्तान की अखंडता और हिंदू का अस्तित्व एक-दूसरे के पूरक हैं; एक के कमजोर होने पर दूसरे का पतन निश्चित है।

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